भविष्य को यज्ञ के साथ जोडऩे का प्रयास

भविष्य को यज्ञ के साथ जोडऩे का प्रयास

हमारे भारतीय सनातन परंपरा में यज्ञ को बहुत ऊंचा और महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यज्ञ पर अमेरिका में हुए शोधों में पाया गया कि वृष्टि, जल एवं वायु की शुद्धि, पर्यावरण संतुलन एवं रोग निवारण में यज्ञ की अहम भूमिका है।

यज्ञ क्या है?

यज्ञ संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- आहुति, चढ़ावा। यज्ञ उद्देश्यपूर्ण होता है। यहां तक कि इसका लक्ष्य ब्रह्मांड की स्वाभाविक व्यवस्था को कायम रखना है। वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है। हवन हुए पदार्थ वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं। यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंत:करण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है। इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयत्न से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है।

भगवान स्वयं यज्ञ रूप हैं, जिनसे सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है। इस प्रकार यज्ञ के अतिरिक्त संसार में कुछ नहीं है। चारों वेग भी इस यज्ञ रूप भगवान से उत्पन्न हुए हैं, अत: यह यज्ञ रूप ही है उनमें जो कुछ भी है, वह भी यज्ञ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, अर्थवेद में प्रश्न पूछा है कि में तुमसे पूछता हूँ  कि सम्पूर्ण जगत को बांधने वाली वस्तु कौन है? इसका उत्तर दिया है कि यज्ञ ही इस पूरे संसार, ब्रह्माण्ड को बांधने वाला है। हमारे पूर्वज भलि-प्रकार जानते थे कि-

स्वास्थ्य सुख सम्पत्ति दाता, दु:ख हारी यज्ञ है।

भूलोक से सूर्य तक, शुभ परम् पवन यज्ञ है।।  

सर्व भूतों के सभी विध, दु:ख नसावन यज्ञ है।

इसीलिए प्राचीन काल में घर घर में यज्ञ होते थे। इस पुण्य भूमि में इतने यज्ञ होते रहे है कि हमारा देश ही यज्ञ देश कहलाया गया। पहले बड़े बड़े राजा महाराजा भी यज्ञ के रहस्य को भलि प्रकार समझते थे और बड़े बड़े यज्ञों का आयोजन किया करते थे। महाराजा रघु ने दिग्विजय के बाद विश्वजीत नामक यज्ञ में समस्तम नामक खजाना खाली कर दिया था। उनके पास धातु का एक पात्र तक नहीं बचा था। पांडवों ने भगवान कृष्ण की अनुमति से महाभारत के बाद राजस्यु यज्ञ कराया था7 भगवान राम ने अश्वमेधादि बड़े बड़े यज्ञ कराये थे7   दैत्यराज बलि ने इतना बड़ा यज्ञ कराया था कि यज्ञ की शक्ति से प्रसन्न  होकर उसने इंद्र को स्वर्ग लोग से निकाल दिया था7 जिस पर उदिति की तपस्या करने पर, इंद्र को इन्द्रासन वापिस दिलाने के लिए विवश होकर भगवान को स्वयं वामन रूप में उपस्तिथ होना पड़ा यज्ञों के बल पर इन्द्रासन वापिस प्राप्त किया था7

 तीर्थों की स्थापना का आधार यज्ञ ही थे7 जहाँ प्रचुर मात्रा में बड़े- बड़े यज्ञ ही होते थे7 उसी स्थान को तीर्थ मान लिया जाता था7 प्रयाग, कशी, रामेश्वरम, कुरुक्षेत्र आदि सभी क्षेत्रों में तीर्थों का उद्धव यज्ञों से ही हुआ है7

हमारे वेद शास्त्रों का  पन्ना-पन्ना यज्ञ की महिमा से भरा पड़ा है7 देखिये ऋग्वेद में सर्वशांति का आधार भी यज्ञ ही है ( 10\66\22) यज्ञ को  आगे करके कार्य आरम्भ करो7 यज्ञ से साथ किये गए कार्य सदैव सफल होते हैं7 (10/101/2)…… यज्ञ से परमात्मा प्रसन्न होते हैं7(1/14/4)….. मुक्ति के अधिकारी याजदेव हैं7 सच मुच यज्ञ के बिना मुक्ति नहीं मिलती7 (1/45/2) यह यज्ञ देवफ तक ले जाने वाला है7 यह पवित्र है और पवित्र करने वाला है7 यजुर्वेद में यज्ञ की महत्ता पर इस प्रकार परकसह डाला गया है यग तप का स्वरूप है7 (4\2\26)…. यज्ञ में दी हुई आहुत्तियाँ कल्याण कारक होती हैं7 जिन्हे कल्याण की इच्छा हो, वह यज्ञ में आहुतियां दें7 (2/30)…. जो यज्ञ को छोड़ देता है7 उसे यज्ञ रूप परमात्मा भी छोड़ देता है7 (2/23) यज्ञ ही मुख्य धर्म है7

मन, वाणी, उन्नति की वृद्धि तब होगी जब यज एवं यज्ञपति की उपासना की जाये7 (30/1)…… यज्ञ से सब दिशाएं अनुकूल बन जाती हैं7 (13/15)… यह अग्नि सहस्त्रों संख्यावालें, बल का स्वामी हैं7 धनों का मुख्य दाता और क्रांति दर्शक है7 (15/21)….. अग्नि विश्व का प्रेरक है7 (15/33)…..अर्थवेद का कथन है यज्ञ करने वाले को सुख प्राप्त होता है7 जिन्हे स्वर्गीय सुख प्राप्त करना अभियिष्ट हो,वे जरूर यज्ञ करें7 (18/4/2)……………..

यज्ञ न करने वाले का तेज नष्ट हो जाता है अथवा अपनी तेजस्विता स्थिर रखने के लिए यज्ञ किया कीजिए, जो इस अग्नि के चारों ओर बैठकर दिव्य उद्देश्य से है7 (6/ 75) ब्राह्मण ग्रंथों में देखिये यज्ञ का पुण्य फल कभी नष्ट नहीं होता7 बुद्विमानी पूर्वक यज्ञ का अक्षय पुहवी  चढ़ाते हैं, उनके हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित  होता है7 यज्ञ श्रेश्ठतम कर्तव्य, कर्म है7 ….. यह अग्नि होम निश्चय ही  स्वर्ग सुख प्राप्त कराने वाली विशेष नौका है7……… यज्ञ ही विष्णु है7 …. यज्ञ ही प्रजापति है, यह ही सूर्य है7 गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है मैं ही यज्ञ हु और कई स्थलों पर उपदेश देते हुए बताया है कि यज्ञ न करने वाले को न ही लोक न ही परलोक कुछ भी प्राप्त नहीं होता है7 …… यज्ञ के निमित्त किए गए कर्मों के सिवाय दूसरे कर्मों के करने से यह मनुष्य कर्म बंधन में बंधता है7…………..   यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूटते हैं7 ……. हवन क्रिया ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म रूपी अग्नि में हवन किया जाता है और ब्रह्म ही हवनकर्ता है7 इसी प्रकार जिस की बुद्धि में सभी  कर्म ब्रह्म हो जाते हैं7 वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है। …….. यज्ञ करने योग्य कर्म है।

यज्ञ एक चिकित्सा है

यज्ञ स्वयं में एक चिकित्सा है। यज्ञ वायु मण्डल को शुद्ध करके रोगों और महामारियों को दूर करता है। प्राचीन काल में ऋषि-महर्षि यज्ञ द्वारा वर्षा कराते थे, फसल को कीटों से बचाने के लिए यज्ञ करते थे और पौधों को खाद देने के लिए यज्ञ राख का प्रयोग करते थे।

प्राचीन काल में यज्ञ चिकित्सा अत्यंत उत्कृष्ट थी। अथर्ववेद में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। अथर्ववेद मंडल 3 सूक्ति 11 मंत्र 2 के अनुसार किसी की आयु क्षीण हो चुकी है, जीवन से निराश हो चुका है, मृत्यु के बिल्कुल समीप पहुंच चुका है, उसे यज्ञ चिकित्सा द्वारा स्वस्थ किया जा सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि यज्ञ चिकित्सा संसार की सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति है जो मृत्यु के मुख से भी मनुष्य को छीन कर स्वस्थ बनाने की क्षमता रखती थी।

यज्ञ करने से क्या लाभ है

अथर्ववेद में रोगोत्पादक कृमियों का वर्णन आता है। श्वास, वायु, भोजन द्वारा शरीर में पहुंच कर शरीर को रोगी करते हैं। यज्ञ द्वारा कर्मी विनाशक औषधियों की आहुति देकर इस रोग कृमियों को विनष्ट कर रोगों से बचा जा सकता है। अग्नि में डाली हुई सामग्री रोगों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है जिस प्रकार नदी का पानी झागों को बहा ले जाता है।

यज्ञ से मकानों के अंधकार पूर्ण कोनों में, संदूक के पीछे पाइप आदि सामानों के पीछे, दीवारों की दरारों में तथा गुप्त स्थानों में जो रोग कर्मी बैठे रहते है वे कर्मी औषधियों के यज्ञीय धूम से विनष्ट हो जाते हंै।

यज्ञ का धुआं (दूध, पानी, वायु) आदि के माध्यम से शरीर के अन्दर पहुंचे हुए रोग कर्मी को नष्ट करके शरीर को स्वस्थ बनाता है।

यज्ञ द्वारा रोग निवारण की प्रक्रिया यज्ञ से औषधि युक्त सामग्री और गौ घी की आहुति से रोग निवारण गंध वायु मंडल में फैल जाती है। वह श्वास द्वारा फैफड़ों में भरती है। उस वायु का रक्त से सीधा सम्पर्क होता है। रोग निवारक परमाणुओं को वह वायु रक्त में पहुंचा देता है और रक्त में विद्यमान रोग कर्मी मर जाते हैं।

बीमारियों के हिसाब से सामग्री

शुभ समय वैदिक फाउंडेशन ने प्राचीन काल में होने वाले यज्ञ के माध्यम से ज्ञान एकत्र कर कलयुग में फैल रही बीमारियों के अनुसार समिधा (सामग्री) तैयार की है। ऋषि-मुनियों के अनुसार कलियुग में पूरा संसार जहां अनेक प्रकार की बीमारियों से तड़प रहा होगा। वहीं यह यज्ञ, हवन मनुष्य को इन बीमारियों से निजात दिलवाएगा।

जो औषधी शरीर के अन्दर प्रविष्ट होकर रोग नष्ट करती है वही औषधि यज्ञ के माध्यम से धुएं के परमाणुओं से प्रयुक्त होकर सूक्ष्म गैस बनकर श्वास के साथ शरीर में प्रविष्ट होकर इंजेक्शन की भांति तत्काल सीधी रक्त में मिलकर रोग को नष्ट करती है।

विषमज्वर, खाज पीव, महामारी, टाइफाइड फीवर, कैंसर, मलेरिया ज्वर, हैजा, क्षय, चेचक आदि के विष शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

यज्ञ के विशेष लाभ

यज्ञ में जो थोड़ा सा समय और पैसा खर्च होता है उसकी अपेक्षा अनेकों गुना लाभ प्राप्त होता है। यज्ञ में भी आकाश रूपी भूमि में, हवन सामग्री रूपी बीज बोने की खेती की जाती है और चूंकि पृथ्वी से आकाश तत्व की शक्ति हजारों गुनी अधिक मानी जाती है उसी अनुमान से इस यज्ञीय खेती की फसल में हजारों गुना अधिक लाभ होता है।इंटरडिसिप्लनरी जर्नल ऑफ यज्ञ रिसर्च में प्रकाशित शोध में दावा किया गया है कि वेदों और उपनिषदों समेत प्राचीन ग्रंथों में वर्णित यज्ञ नामक तकनीक विशेष रूप से अंदर के पर्यावरण में कणिका तत्व (पीएम) स्तर को कम कर सकती है जो वायु प्रदूषण का कारण है।

यज्ञ एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मंत्रों के लयबद्ध जप के साथ जड़ी-बूटियों को आग में छोड़ा जाता है।

प्रारंभिक सबूतों के अनुसार, यज्ञ वायु प्रदूषण से उत्पन्न सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ 2) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) के स्तर के साथ ही सूक्ष्मजीवों जैसे जैविक वायु प्रदूषकों को कम करता है।

वर्तमान अध्ययन ने दिसंबर 2017 में घर के अंदर के वातावरण में मौजूद कणिका तत्व पर यज्ञ के प्रभाव पर हुए दो शोधों का आकलन किया था।

दिल्ली के कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग की सलाहकार ममता सक्सेना ने कहा कि निष्कर्षो में पता चलता है घर के अंदर यज्ञ करने के बाद कणिका तत्व 2.5, 10 और कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) में कमी देखी गई है।

2.5 माइक्रोमीटर से कम आकार के कणों को स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में घोषित किया जाता है, क्योंकि वे फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं और वहां खुद को स्थापित कर लेते हैं, जो सांस व हृदय रोगों और नवजात के मृत्यु दर का कारण बन सकता है।

इस हेतु हमने सर्वप्रथम आने वाले भविष्य को यज्ञ के साथ जोडऩे का प्रयास प्रारम्भ किया। इस हेतु हमने विचार किया कि स्कूल संचालकों के साथ मिलकर पढऩे वाले बच्चों का यज्ञ के साथ संबंध स्थापित किया जाए। हमारे इस विचार को थोड़े ही समय में बहुत अच्छा सहयोग मिला और दो स्कूलों में यज्ञशाला स्थापित एवं संचालित होना प्रारम्भ हो गई एवं अन्य कई स्कूल संचालकों के साथ हम इसके लिए प्रयासरत हैं।

इन यज्ञशालाओं में प्रात: उस दिन जन्मदिन वाले बच्चों को यज्ञ करवाया जाता है, उन्हें सुभाषित वचन सुनाए जाते हैं एवं प्रसाद प्रदान किया जाता है। इन हवन में उनके अभिभावकों को भी निमंत्रित किया जाता है। इस प्रकार एक लघु प्रयास से भारतीय संस्कारों को पोषित किया जा रहा है।

दिनांक तीन फरवरी 2020 को सेक्टर 56 स्थित फौगाट पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में शुभसमय वैदिक फाउंडेशन का संचालन प्रारम्भ हुआ। स्कूल के निदेशक डॉ सतीश फौगाट यज्ञशाला के संचालन के प्रति काफी सजग रहते हैं।

दिनांक नौ अप्रैल 2021 को ग्रेटर फरीदाबाद घरौडा स्थित विद्यासागर इंटरनेशनल स्कूल में संस्कारशाला का संचालन प्रारम्भ हुआ। स्कूल निदेशक दीपक यादव स्वयं यज्ञ में यजमान बनकर बड़े प्रसन्न होते हैं।

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